Thursday, January 29, 2009

Preface or Forward or Introduction

This is one of the best Preface or Forward or Introduction whatever you call it with a reason why it should be written…

From the book
“Believe in God who Believes in you?"
By Robert H. Schullar


Be hopeful! For tomorrow has never happened before
R.H.S.

An opening word

“Tell me please:

Why does a symphony need an overture?
Why does a building have a front portico?
Why does a star on a stage need a warm – up act?
I’ve noticed some books have prefaces other books have forwards, any books have introductions.
I’m confused. Who needs them?

The Marketing folks? “Get a big name to write the introduction. It will help sell the product.”

The layout people? “The book’s too thin? Fatten it up. Put in some stuffing. Yes! That’s it! A forward!”

The author? He finished the book but forgot something?
Stick it up front and call it a preface.
The critic? She has to review this book and needs to get to the heart of matter in a hurry
The reader? He needs to be set up for what’s coming.
His mind is in a dozen (a hundred?) other places. You’ve got to draw his attention to what you’re saying.
I’m still perplexed. The rules are vague. The roles overlap.
The job descriptions are not clear.
The specifications are fuzzy. The definitive standards? There aren’t any.

So for this book, at least, I’ll do my thing. Call it sorting out my audience… screening the readers…
The Forward is directed to the agnostic or atheist or secular reader.
The Preface is directed to the religious reader.

So I trust I have written for you – whoever and wherever you are – so that you will indeed come to know and believe in the God who believes in you.”


I've never ever in my whole life found such a simply great Forward...

Wednesday, January 21, 2009

खो खो

तनहा

देखीए तो लगता है
जिंदगी की राहों मै
एक भीड चलती है

सोचिए तो लगता है
भीड मे है सब तनहा

जितने भी ये रिश्ते है
काँच के खिलोने है
पल मे तूट सकते है... एक पल मे हो जाएं कोन जाने कब तनहा...

देखीए तो लगता है
जैसे ये जो दुनियॉं है
कितनी रंगी महफिल है
सोचिए तो लगता है कितना गम है दुनियाँ मे कितना जख्मी हर दिल है...

वो जो मुस्कुराते थे
जो किसीको ख्वाबों मे अपने पास पाते थे...
उनकी नींद तूटी है ओर है वो अब तनहा

देखीए तो लगता है
जिंदगी की राहों मै
एक भीड चलती है

सोचिए तो लगता है
भीड मे है सब तनहा

ह्याला कविता म्हणण उचित ठरणार नाही कारण फार काळापूर्वी "स्टार प्लस" वर "तनहा" ही एक वीकली सिरीयल लागायची त्याचच हे शीर्षक गीत! आणि दुसरी आहे ती गझल: रूप कुमार राठोड ह्यांची ऐसा कोई जिंदगी से वादा तो नही था...

ऐसा कोई जिंदगी से वादा तो नही था... तेरे बीना जिने का इरादा तो नहीं था (२)

तेरे लिए रातों मे चांद नी उगाई थी त्यारीयोंमें खुशबूकी रोशनी लगाई थी (२)
जाने क हॉ तूटी है डोर मेरे ख्वाब की ख्वाबसे जागेंगे सोचा तो नहीं था

ऐसा कोई जिंदगी से वादा तो नही था... तेरे बीना जिने का इरादा तो नहीं था (२)

श्यामियाने श्यामों के रोज ही स जाए थे कितनी उम्मीदोके मेहमाँ बुलाए थे(२)
आके दरवाजेसे लोट गए हो युभी कोई आएगा सोचा तो नहीं था

ऐसा कोई जिंदगी से वादा तो नही था... तेरे बीना जिने का इरादा तो नहीं था (२)

ह्याला कविता म्हणण उचित ठरणार नाही कारण फार काळापूर्वी "स्टार प्लस" व र "तनहा" ही एक वीकली सिरीयल लागायची त्याचच हे शीर्षक गी त! आणि दु स री आहे ती गझल: रूप कुमार राठोड ह्यांची ऐसा को ई जिंदगी से वादा तो नही था...
ऐसा को ई जिंदगी से वादा तो नही था... तेरे बीना जिने का इरादा तो नहीं था (२)

तेरे लिए रातों मे चांद नी उगाई थी त्यारीयोंमें खुशबूकी रोशनी लगाई थी (२)
जाने क हॉ तूटी है डोर मेरे ख्वाब की ख्वाबसे जागेंगे सोचा तो नहीं था

ऐसा को ई जिंदगी से वादा तो नही था... तेरे बीना जिने का इरादा तो नहीं था (२)

श्यामियाने श्यामों के रोज ही स जाए थे कितनी उम्मीदोके मेहमाँ बुलाए थे(२)
आके दरवाजेसे लोट गए हो युभी कोई आएगा सोचा तो नहीं था

ऐसा कोई जिंदगी से वादा तो नही था... तेरे बीना जिने का इरादा तो नहीं था (२)


त्या वेळेच्या ह्या दोन मला अतिशय आवडणा र्‍या गझल म्हणजे आता ही आवडतात पण उस वक्त की बात ही कुछ गजबकी है!
आता खो: माझा खो फिरून संवेद अन् प्रशांतला! :)


(मायबोली वरून हिंदी लिखाणाचा हा प्रयत्न केला आहे दुसरा फाँट नसल्याने शुद्धलेखनाच्या चुका असतील माफी असावी!

Tuesday, January 20, 2009

क्षण!

आयुष्य हे भुर्रकन उडून जातं पण आपल्या आठवणी मागे ठेवून जाते
जीवनातले क्षण राहतात, ब र्‍यायाचदा अपूर्ण तरीही त्यांना म्हणायच असतं पूर्ण
अळवावरच पाणी जसं फसवं असतं, क्षणही तसेच काही... जीवनात फसवून जातात
त्या क्षणांच्या आठवणीनं मनात काहूर माजतं खूप काही बोलायच असतं अन् शब्दच हरवतात